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| Visual by Gemini |
कल ही की बात है, मैं अपने कुछ ज़रूरी कामों और जीवन के कुछ फैसलों को लेकर बहुत परेशान था। मुझे लग रहा था कि मेरे सारे सवालों के जवाब मुझे अभी, इसी वक़्त मिल जाने चाहिए। सच कहूँ तो दोस्तों, आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम सब कुछ 'इंस्टेंट' (Instant) चाहते हैं। मैगी दो मिनट में चाहिए, इंटरनेट की स्पीड पलक झपकते ही चाहिए, और तो और, जीवन की किसी बड़ी परेशानी का हल भी हमें रातों-रात चाहिए होता है।
लेकिन क्या सच में जीवन की उलझनें इतनी जल्दी सुलझती हैं? ऐसे ही तनाव भरे पलों में, जब मेरा दिमाग ओवरथिंकिंग (Overthinking) करके थक जाता है, तो मुझे एक पुरानी कथा याद आ जाती है जिसने मुझे हमेशा एक गहरी शांति दी है। आज 'स्वरांजल' के मंच से मैं वही कथा आपके साथ साझा करना चाहता हूँ, जो आपको यह सोचने पर मजबूर कर देगी कि आखिर 'धैर्य' (Patience) में इतनी ताकत क्यों होती है।
मटमैले पानी का रहस्य (मेरा पसंदीदा किस्सा)
बात बहुत पुरानी है। एक बार गौतम बुद्ध अपने कुछ शिष्यों के साथ एक गाँव से दूसरे गाँव पैदल जा रहे थे। सफर लंबा था और गर्मी के दिन थे। चलते-चलते दोपहर हो गई और बुद्ध को बहुत प्यास लगी।
उन्होंने अपने एक शिष्य से कहा, "बेटा, मुझे बहुत प्यास लगी है। ज़रा पीछे मुड़कर देखो, हमने कुछ दूर पहले एक छोटी सी झील पार की थी। वहाँ से मेरे लिए थोड़ा पानी ले आओ।"
शिष्य तुरंत बर्तन लेकर उस झील की तरफ दौड़ पड़ा। लेकिन जब वह वहाँ पहुँचा, तो उसने देखा कि अभी-अभी कुछ बैलगाड़ियाँ उस झील के किनारे से गुज़री हैं। उन बैलगाड़ियों के पहियों की वजह से झील के नीचे की सारी मिट्टी और कीचड़ ऊपर आ गया था। जो पानी कुछ देर पहले एकदम साफ था, वह अब पूरी तरह गंदा और मटमैला हो चुका था।
शिष्य सोचने लगा, "मैं बुद्ध को यह कीचड़ वाला पानी कैसे पिला सकता हूँ?" वह खाली हाथ वापस लौट आया और बोला, "तथागत, वहाँ का पानी बहुत गंदा हो गया है। बैलगाड़ियों ने सारी मिट्टी ऊपर कर दी है। वह पानी पीने लायक नहीं है।"
बुद्ध ने बस एक हल्की सी मुस्कान दी और कहा, "कोई बात नहीं, हम यहीं एक पेड़ के नीचे थोड़ा विश्राम कर लेते हैं।"
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धैर्य का असली जादू
करीब आधे घंटे तक सभी ने आराम किया। उसके बाद बुद्ध ने उसी शिष्य को दोबारा बुलाया और कहा, "जाओ, अब जाकर उसी झील से पानी लेकर आओ।"
शिष्य मन ही मन थोड़ा झुंझलाया कि जब पानी गंदा है तो दोबारा जाने का क्या फायदा? लेकिन गुरु का आदेश था, इसलिए वह फिर से झील की तरफ चल दिया।
जब वह वहाँ पहुँचा, तो वह हैरान रह गया। झील का पानी बिल्कुल शीशे की तरह साफ चमक रहा था! जो मिट्टी और कीचड़ पानी में घुला हुआ था, वह सारा धीरे-धीरे नीचे सतह पर बैठ गया था। शिष्य ने खुशी-खुशी साफ पानी भरा और बुद्ध के पास ले आया।
बुद्ध ने पानी पिया और फिर शिष्य की तरफ देखकर जो बात कही, उसने मेरे जीवन को देखने का नज़रिया ही बदल दिया। बुद्ध बोले, "तुमने देखा? तुमने उस पानी को साफ करने के लिए क्या किया? कुछ भी नहीं! तुमने बस उसे थोड़ा समय दिया, थोड़ा धैर्य रखा। मिट्टी अपने आप नीचे बैठ गई और पानी साफ हो गया।"
"हमारा मन भी बिल्कुल उस झील के पानी की तरह ही है। जब हम गुस्से में होते हैं, परेशान या तनाव में होते हैं, तो मन के विचार मटमैले हो जाते हैं। ऐसे वक्त में कोई भी फैसला लेने के बजाय, बस मन को थोड़ा समय दें। शांत बैठें। आप देखेंगे कि बिना कोई ज़ोर लगाए, मन की सारी उलझनें खुद-ब-खुद नीचे बैठ जाएंगी और आपको सही रास्ता बिल्कुल साफ दिखने लगेगा।"
तो दोस्तों, अगली बार जब भी आपकी ज़िंदगी में कुछ उथल-पुथल मचे या कोई बड़ी मुसीबत सामने आकर खड़ी हो जाए, तो मैं आपसे यही कहूँगा कि घबराकर कोई भी गलत कदम उठाने से बचें। हम अक्सर अपने मन के गंदे पानी में हाथ-पैर मारकर कीचड़ को और उछाल देते हैं। बस थोड़ा सा 'धैर्य' रखें। याद रखिए, समय के पास हर उस पानी को साफ करने की ताकत है जो आज गंदा लग रहा है।
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आपको यह कहानी कैसी लगी? क्या आपने भी कभी मेरी तरह अपने जीवन में धैर्य रखकर कोई बड़ी मुश्किल हल की है? मुझे नीचे कमेंट्स में ज़रूर बताएँ, मुझे 'स्वरांजल' परिवार के अनुभव पढ़कर बहुत खुशी होगी।

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