रात्री शांति समर्पण स्तोत्र (Ratri Shanti Samarpan Stotra): Lyrics, Hindi Meaning & HD Audio

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रात्री शांति समर्पण स्तोत्र - स्वरांजल

Ratri Shanti Samarpan Stotra With Lyrics And Hindi Meaning - HD

रात्रि केवल विश्राम का समय नहीं है, बल्कि यह समय है अपनी आत्मा के सम्मुख होने का। दिन भर की भागदौड़, दुनिया को दिखाए गए मिथ्या वेश (झूठे रूप) और अहंकार के संघर्षों के बाद जब अंतर्मन मौन होता है, तब ही परमात्मा की सच्ची समीपता का अनुभव होता है।

'रात्रि शांति समर्पण स्तोत्र' कोई सामान्य स्तुति नहीं है, यह एक ऐसी पुकार है जो तब जन्म लेती है जब मनुष्य स्वयं के बनाए हुए बोझ और दिखावे से थक जाता है। जीवन में एक पल ऐसा आता है जब इंसान समझ जाता है कि अहंकार उसे ऊपर उठाता है और हीनता उसे नीचे गिराती है, और इन दोनों के बीच भटकते हुए जीवन व्यर्थ हो रहा है।

जब हम अपने सारे दोषों, पापों, दंभ और भ्रम को प्रभु के चरणों में अर्पित कर देते हैं, तभी हमें उस परम शांति की प्राप्ति होती है। अगर आपका मन आज अशांत है या दुनिया के दिखावे से थक चुका है, तो एकांत में बैठें, आँखें बंद करें और इस स्तोत्र को सुनें। यह रचना आपके अहंकार को विसर्जित कर आपको परमेश्वर में विलीन होने का मार्ग दिखाएगी।

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रात्री शांति समर्पण स्तोत्र (HD Audio) Swaranjal Originals • Devotional
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Ratri Shanti Samarpan Stotra Video
हे नाथ… शरणं… प्रपद्ये…
क्लान्तोऽहं… तव सन्निधौ…

हे नाथ शरणं प्रपद्ये, क्लान्तोऽहं तव सन्निधौ।
मिथ्यावेषं परित्यज्य, स्थितोऽहं तव सन्निधौ॥
अर्थ: हे प्रभु… मैं आपकी शरण में आता हूँ… मैं थका हुआ हूँ और आपके सामने उपस्थित हूँ। हे प्रभु, मैं आपकी शरण में आया हूँ, मैं थका हुआ आपके सामने खड़ा हूँ। अपने सारे झूठे रूप और दिखावे छोड़कर, अब मैं आपके सामने आ गया हूँ।
दिवसभ्रमणेन खिन्नः, सत्यं ज्ञात्वा अपि त्यक्तवान्।
स्वार्थान्धकारे मग्नः, आत्मानं विस्मृतोऽभवम्॥
हास्येनापि दुःखं गूढं, वाचा गर्वो प्रकाशितः।
चित्ते दम्भः पुनः पुनः, मया एव पोषितः॥
अर्थ: पूरे दिन भटककर मैं थक गया हूँ, सत्य को जानते हुए भी मैंने उसे छोड़ दिया। स्वार्थ के अंधकार में डूबकर मैंने खुद को ही भुला दिया। हँसते हुए भी मैंने अपना दुख छुपाया, और अपनी बातों में व्यर्थ का घमंड दिखाया। मेरे मन में बार-बार जो दिखावा आया, उसे मैंने ही बढ़ाया है।
अद्य तव समीपे नाथ, सर्वमेतत् प्रकाशितम्।
पापं दम्भं च सर्वं मे, तव पादे समर्पितम्॥
“शरणं प्रपद्ये… शरणं प्रपद्ये…”
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अर्थ: आज हे प्रभु, आपके सामने मैंने यह सब कुछ प्रकट कर दिया है। अपने सारे पाप और दिखावे को आपके चरणों में समर्पित कर दिया है। “मैं आपकी शरण में आता हूँ… बार-बार आपकी शरण में आता हूँ…”
न याचे क्षमां नाथ, न मे दण्डभयम् अस्ति।
त्वत्सत्ये मां जागरय, तव भावे स्थापय॥
भिन्नोऽस्मि च क्लान्तोऽस्मि, स्वभारैः पीडितोऽधुना।
त्वच्छरणं समासाद्य, आत्मानं ज्ञातवानहम्॥
अर्थ: हे प्रभु, मैं आपसे क्षमा नहीं मांगता, और मुझे दंड का कोई भय भी नहीं है। बस मुझे आपके सत्य में जगा दीजिए और अपने भाव में स्थिर कर दीजिए। मैं बिखरा हुआ हूँ, थका हुआ हूँ, अपने ही अहंकार के बोझ से दबा हुआ हूँ। आपकी शरण में आकर ही मैंने खुद को पहचाना है।
मम भ्रान्तिं शमय नाथ, चित्तं मे शान्तिमान् कुरु।
त्वयि एव विलयं यातु, शेषोऽयं मम अहंभावः॥
अहंकारो मां उन्नयति, हीनता मां नयत्यधः।
एतयोर्मध्ये भ्रमन् अहं, जीवनं व्यर्थतां गतः॥
अर्थ: हे प्रभु, मेरे भ्रम को शांत कर दीजिए, मेरे मन को असीम शांति प्रदान कीजिए। मेरा यह अहंकार आप में ही विलीन हो जाए, और कुछ भी शेष न रहे। कभी अहंकार मुझे ऊपर उठाता है, तो हीनता मुझे नीचे गिराती है। इन दोनों के बीच भटकते हुए ही मेरा जीवन व्यर्थ होता चला गया।
नाहं साधुः न चासाधुः, न पूर्णो नापि हीनकः।
त्वद्भावे पूर्णतां यामि, त्वद्विना तु निरर्थकः॥
मम “अहम्” इति भावोऽयं, त्वत्समीपे विनश्यतु।
अर्थ: मैं न पूरी तरह अच्छा (साधु) हूँ, न बुरा; न पूर्ण हूँ, न हीन हूँ। केवल आपमें रहकर ही मैं पूर्ण हूँ, आपके बिना मेरा अस्तित्व व्यर्थ है। मेरा यह “मैं” (अहम्) भाव आपके सामने सदा के लिए समाप्त हो जाए।
त्वमेव हृदि मे नाथ, शान्तिरूपेण तिष्ठतु॥
“शान्तिरूपेण तिष्ठतु…”
स्वरांजल इति वदति… त्वमेव मम जीवनम्…
अर्थ: हे प्रभु, आप ही मेरे हृदय में शांति के रूप में सदैव निवास करें। “आप शांति के रूप में मेरे भीतर बने रहें…” यह 'स्वरांजल' कहता है… कि अब आप ही मेरा जीवन हैं…

निष्कर्ष (Conclusion)

'रात्रि शांति समर्पण स्तोत्र' मात्र कुछ शब्दों का समूह नहीं, बल्कि आत्मा का परमात्मा में विलीनीकरण है। जब हम अपनी सारी उपलब्धियों, भूलों और अहंकारों को प्रभु के चरणों में रख देते हैं, तब जो शेष बचता है, वही 'शांति' है। यह रचना हमें याद दिलाती है कि हम न तो पूर्ण हैं और न ही हीन, हम केवल उस ईश्वरीय सत्ता का एक अंश हैं। जब तक हम उस 'एक' के भाव में स्थित नहीं होते, हमारा जीवन व्यर्थता के दो पाटों (अहंकार और हीनता) के बीच पिसता रहता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. 'रात्री शांति समर्पण स्तोत्र' का मुख्य भाव क्या है?

यह स्तोत्र आत्मा का परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण है। जब मनुष्य दिनभर के दिखावे, अहंकार और व्यर्थता से थक जाता है, तब वह अपने असली रूप में ईश्वर के सामने आकर असीम शांति की गुहार लगाता है।

Q2. स्तोत्र में 'मिथ्यावेषं परित्यज्य' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है "सारे झूठे रूप और दिखावे छोड़कर"। समाज के सामने हम जो झूठा मुखौटा पहनते हैं, उसे हटाकर और अपने अहंकार को त्याग कर ही ईश्वर की सच्ची शरण प्राप्त की जा सकती है।

Q3. क्या इस स्तोत्र का पाठ केवल रात्रि में ही किया जा सकता है?

यद्यपि इसका नाम 'रात्री शांति समर्पण' है और सोने से पूर्व एकांत में इसका पाठ सर्वाधिक फलदायी माना जाता है, लेकिन जब भी आपका मन अशांत हो और आप दुनिया की भागदौड़ से दूर ईश्वर की शरण में जाना चाहें, आप इसका श्रवण या पाठ कर सकते हैं।

Q4. "त्वद्भावे पूर्णतां यामि, त्वद्विना तु निरर्थकः" का क्या आशय है?

इसका आशय है कि मनुष्य ईश्वर के बिना पूरी तरह से अधूरा और व्यर्थ है। केवल परमेश्वर के प्रेम और उनके भाव में लीन होकर ही हम अपने जीवन की पूर्णता (Completeness) को प्राप्त कर सकते हैं।

Q5. मैं इस स्तोत्र का HD Audio और PDF कैसे डाउनलोड कर सकता हूँ?

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महादेव आप सभी के जीवन को असीम शांति से भर दें। हर हर महादेव! 🙏
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